जब अन्याय के अंधकार में साहस की ज्योति बुझने लगे, तब महावीर की हुंकार भीतर का सोया हुआ पौरुष जगा देती है।
॥ महावीर-हुंकार ॥
दो राहों पर खड़ा समय है, रथ का घर्घर-नाद सुनो,
नभ के ललाट पर लिखी हुई, प्रलय-गर्जना की बात सुनो।
वह बढ़ा पवन-वेग लिए, अंबर का वक्ष विदीर्ण किए,
सिंदूरी तन, विद्युत-नयन, कर में गिरि-शैल प्रचंड लिए।
रे अभिमानी! दृष्टि उठा, यह लघुता का विस्तार नहीं,
यह महाप्राण की ज्वाला है, केवल वानर का प्यार नहीं।
जिसने सागर लाँघ दिया, वह सत्य-दीप्त पथगामी है,
वह राम-नाम की ओज-शिखा, वह धर्म-युद्ध का अभिरामी है।
जब स्वर्णपुरी की प्राचीरों पर उसका हुंकार उठा,
दशग्रीव के मिथ्या दर्प का, तब एक-एक कण टूट पड़ा।
पूँछ नहीं, वह काल-पाश थी, जिसने लंका को जकड़ लिया,
एक अकेले वानर ने, इतिहास-चक्र ही पलट दिया।
सुन रावण! वैभव के बल पर तूने जग को जीत लिया,
पर एक तपस्वी के तेज ने, तेरा सारा दंभ भस्म किया।
तप की अग्नि में तपा हुआ, वह कंचन-काया धारी है,
वह राम-भक्त, वह वीर-श्रेष्ठ, रणभूमि का अधिकारी है।
खल-दल के काल, हे वज्र-देह, तू जाग्रत पौरुष का प्रतीक,
जहाँ गूँजती तेरी गदा, वहीं खिंचती मर्यादा-रेख।
तेरे चरणों की धूल जहाँ, वहाँ भय टिकता नहीं कभी,
तेरे स्मरण से टूट जाए, मन की हर दुर्बलता सभी।
तू पर्वत-सा अचल खड़ा, तू सिंधु-सा अगाध अपार,
तेरे भीतर राम बसे हैं, तेरे भीतर धर्म-प्रहार।
तू आज भी हिमगिरि की चोटी, या अम्बर के उन छोरों पर,
तेरा आशीष सतत बरसता, भारत के सब रणधीरों पर।
जहाँ अधर्म अट्टहास करे, वहाँ तेरा हुंकार जगे,
जहाँ निराशा घेर खड़ी हो, वहाँ तेरा विश्वास जगे।
जहाँ अन्याय खड़ा हो बनकर, अभेद्य कोई लौह-कपाट,
वहाँ बजरंगी नाम पुकारे, टूट पड़े हर भय की रात।
न धन चाहिए, न यश चाहिए, न स्वर्ग-सुख की अभिलाषा,
बस चरणों में राम रहें और, मुख पर रहे उन्हीं की भाषा।
हे अंजनि-सुत! हे पवन-पुत्र! फिर वह दिव्य प्रकाश जगा,
सोए हुए इस भारत के, अंतर में फिर विश्वास जगा।
तेरी हुंकार में धर्म जगे, तेरी भक्ति में शक्ति जगे,
तेरे नाम से जन-मन में, साहस की अमर ज्योति जगे।
जय हो तेरी महावीर! जय पवनसुत बलधाम,
तेरी शरण में शक्ति हमारी, हृदय में बसे श्रीराम।
॥ महावीर-हुंकार ॥
दो राहों पर खड़ा समय है, रथ का घर्घर-नाद सुनो,
नभ के ललाट पर लिखी हुई, प्रलय-गर्जना की बात सुनो।
वह बढ़ा पवन-वेग लिए, अंबर का वक्ष विदीर्ण किए,
सिंदूरी तन, विद्युत-नयन, कर में गिरि-शैल प्रचंड लिए।
रे अभिमानी! दृष्टि उठा, यह लघुता का विस्तार नहीं,
यह महाप्राण की ज्वाला है, केवल वानर का प्यार नहीं।
जिसने सागर लाँघ दिया, वह सत्य-दीप्त पथगामी है,
वह राम-नाम की ओज-शिखा, वह धर्म-युद्ध का अभिरामी है।
जब स्वर्णपुरी की प्राचीरों पर उसका हुंकार उठा,
दशग्रीव के मिथ्या दर्प का, तब एक-एक कण टूट पड़ा।
पूँछ नहीं, वह काल-पाश थी, जिसने लंका को जकड़ लिया,
एक अकेले वानर ने, इतिहास-चक्र ही पलट दिया।
सुन रावण! वैभव के बल पर तूने जग को जीत लिया,
पर एक तपस्वी के तेज ने, तेरा सारा दंभ भस्म किया।
तप की अग्नि में तपा हुआ, वह कंचन-काया धारी है,
वह राम-भक्त, वह वीर-श्रेष्ठ, रणभूमि का अधिकारी है।
खल-दल के काल, हे वज्र-देह, तू जाग्रत पौरुष का प्रतीक,
जहाँ गूँजती तेरी गदा, वहीं खिंचती मर्यादा-रेख।
तेरे चरणों की धूल जहाँ, वहाँ भय टिकता नहीं कभी,
तेरे स्मरण से टूट जाए, मन की हर दुर्बलता सभी।
तू पर्वत-सा अचल खड़ा, तू सिंधु-सा अगाध अपार,
तेरे भीतर राम बसे हैं, तेरे भीतर धर्म-प्रहार।
तू आज भी हिमगिरि की चोटी, या अम्बर के उन छोरों पर,
तेरा आशीष सतत बरसता, भारत के सब रणधीरों पर।
जहाँ अधर्म अट्टहास करे, वहाँ तेरा हुंकार जगे,
जहाँ निराशा घेर खड़ी हो, वहाँ तेरा विश्वास जगे।
जहाँ अन्याय खड़ा हो बनकर, अभेद्य कोई लौह-कपाट,
वहाँ बजरंगी नाम पुकारे, टूट पड़े हर भय की रात।
न धन चाहिए, न यश चाहिए, न स्वर्ग-सुख की अभिलाषा,
बस चरणों में राम रहें और, मुख पर रहे उन्हीं की भाषा।
हे अंजनि-सुत! हे पवन-पुत्र! फिर वह दिव्य प्रकाश जगा,
सोए हुए इस भारत के, अंतर में फिर विश्वास जगा।
तेरी हुंकार में धर्म जगे, तेरी भक्ति में शक्ति जगे,
तेरे नाम से जन-मन में, साहस की अमर ज्योति जगे।
जय हो तेरी महावीर! जय पवनसुत बलधाम,
तेरी शरण में शक्ति हमारी, हृदय में बसे श्रीराम।
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