कथ्य और दृष्टि के बीच
कहानी जिस पक्ष से सुनोगे,
सत्य उसी का आकार धर लेगा—
जैसे जल,
जिस पात्र में ढलता है,
उसी का रूप ओढ़ लेता है।
पर क्या सच इतना सरल है
कि वह शब्दों की उँगलियों पर नाच उठे?
या वह उन मौन दरारों में छिपा है
जहाँ कथन भी जाने से कतराता है?
एक ओर स्मृतियों की रोशनी है,
जो अपने ही अतीत को आलोकित करती है,
दूसरी ओर विस्मरण की छाया,
जो अनकहे को भी ढँक लेती है।
दोनों ही अपने-अपने सत्य के प्रहरी,
दोनों ही अधूरे।
कहानी दरअसल कही नहीं जाती,
वह गढ़ी जाती है—
अनुभवों की राख से,
अहंकार की आँच में,
और संवेदनाओं के धुएँ में
धीरे-धीरे आकार लेती है।
जो सुनता है,
वह भी निष्पक्ष कहाँ रह पाता है?
उसकी अपनी इच्छाएँ,
अपने पूर्वाग्रह,
शब्दों के अर्थ बदल देते हैं—
और वही अर्थ, सत्य का मुखौटा पहन लेते हैं।
सत्य, शायद, एक स्थिर बिंदु नहीं,
वह तो बहता हुआ प्रश्न है—
हर दृष्टि के साथ बदलता,
हर अनुभव में पुनर्जन्म लेता।
तो जब भी सुनो कोई कथा,
सिर्फ शब्द मत सुनना—
उनके बीच के मौन को भी पढ़ना,
क्योंकि संभव है,
सत्य वहीं बैठा हो—
निर्वाक,
और तुम्हारी प्रतीक्षा में।
— गौतम झा