जन्माष्टमी

जन्माष्टमी

जब अँधियारी रात में कृष्ण जन्मे, तो केवल मथुरा नहीं, पूरी मानवता के लिए उम्मीद का उजाला हुआ।

जन्माष्टमी

भाद्रपद अष्टमी की रात थी, रिमझिम बरखा बरसी थी,
घनघोर घटाओं के बीच, कोई दिव्य ज्योति हँसी थी।
मथुरा नगरी सोई थी, पर किस्मत जाग रही थी,
अँधियारे के उस आँगन में, नई सुबह-सी भाग रही थी।

कोमल, उज्ज्वल, दिव्य कमल-सा, मुखड़ा मुस्काता था,
नन्हा-सा वह बालक जैसे, जग को राह दिखाता था।
अंग-अंग में प्रेम की लहरें, रास जगाने वाला था,
सूने मन में उमंगों की, आग लगाने वाला था।

नर्म सलोना, घुँघराले केशों में पंख सजाता था,
मोर मुकुट की छाँव में वह, कितना सुंदर लगता था।
मस्त, चंचल, भोला-भाला, रूप बड़ा अलबेला था,
नटखट नंद का लाल वही, यशोदा का लाला था।

माखन की मटकी फोड़-फोड़कर, हँसता और हँसाता था,
ग्वाल-बाल के संग मिलकर, धूम मचाता जाता था।
कभी चितचोर, कभी मनमोहन, कभी बड़ा मतवाला था,
राधा के मन का मोहन था, सबका कृष्ण निराला था।

दीन-दुखी के सूने मन में, प्रेम जगाने वाला था,
आँखों में जो दर्द छिपा हो, उसे मिटाने वाला था।
जिसने उसको प्रेम से देखा, अपना उसको पाया था,
जिसने मन से नाम पुकारा, उसने सुख ही पाया था।

मुरलीधर, मधुसूदन, गिरधर, गोवर्धनधारी था,
भक्तों का रखवाला कृष्ण, दुष्टों पर भारी था।
माखनचोर वही नंदलाला, वही जगत का स्वामी था,
बाल रूप में खेल रहा जो, वही अनंत अभिरामी था।

मुरली की मीठी तानों से, वृंदावन मुस्काता था,
बंसी की हर धुन पर जैसे, मन अपना खो जाता था।
राधा के संग रास रचाकर, प्रेम सिखाने वाला था,
प्रेम जहाँ निष्कलुष हो जाए, कृष्ण वहीं रहने वाला था।

निष्काम कर्म का पाठ पढ़ाया, गीता का उपदेश दिया,
कर्तव्य-पथ पर बढ़ने का, मानव को संदेश दिया।
फल की चिंता छोड़ कर्म कर, जीवन को समझाया था,
सुख-दुख में समभाव रखो, कृष्ण ने यही बताया था।

अर्जुन के मन का संशय हरने, सारथी बनकर आया था,
रण के बीच खड़े योद्धा को, कर्मयोग समझाया था।
पार्थ-सखा बन सत्य की राह पर, आगे उसे बढ़ाया था,
धर्म-अधर्म के बीच खड़े होकर, धर्म का दीप जलाया था।

कभी सुदामा के द्वार पहुँचकर, मित्रता निभाने वाला था,
राजमहल की सारी शोभा छोड़, मित्र को गले लगाने वाला था।
मुट्ठी भर चावल में उसने, प्रेम का धन पहचाना था,
मित्रता के आगे उसने, राजपाट भी छोटा माना था।

द्रौपदी की लाज बचाने वाला, संकट का रखवाला था,
जिसने उसको दिल से पुकारा, उसका वही सहारा था।
जिसने विश्वास किया उस पर, उसका हाथ थाम लिया,
टूटे मन को फिर से जीने का, उसने साहस दे दिया।

धन-दौलत का लोभ उसे था, सोने का अभिमान था,
उसके लिए तो प्रेम ही सबसे सुंदर वरदान था।
राजमहल हो या वन का पथ हो, सबको एक समान किया,
मानव को मानव से जोड़कर, प्रेम का नया विधान दिया।

देवकी की

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3 Comments

P
Praveen Kumar Jha
2 years ago
भाव भरा अनुपम सृजन 👌
InsightfulTake Team
Thank you for sharing your thoughts. We appreciate your feedback and engagement with InsightfulTake.
P
Praveen Kumar Jha
2 years ago
भाव भरा अनुपम सृजन 👌
InsightfulTake Team
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A
Ashok
2 years ago
Truly an insightful creation by a creative mind, journalist and a poet all rolled into one.Amazing.
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