जब मन की उलझनें बढ़ती हैं, तो दुनिया नहीं बदलती, लेकिन इंसान खुद से ज़रूर दूर होता जाता है।
उलझन
उलझन की हस्ती में, दोस्ती कम पड़ जाती है,
जब तन्हाई बोलती है, मस्ती चुप हो जाती है।
सपनों के कागज़ पर, रंग भरना अच्छा लगता है,
चाँदनी रात में भी, पुराना चाँद अच्छा लगता है।
सोचना तो अक्सर, मन की कसरत होती है,
भावों की आहट में, दिल को कहाँ फुर्सत होती है?
जब मन में शोर उठे, दुनिया बेगानी लगे,
सर्दी की भोर हो या जेठ की दोपहरी जले।
उम्मीद ही असल में, सुनहरी तक़दीर है,
हाथों की लकीर तो, आस्था की ज़ंजीर है।
खुद से ही लड़ना है, दुनिया को दिखाना है,
अजीब यह ज़माना है, हर ओर बहाना है।
उलझनों की तुरपाई में, खुशियाँ खो जाती हैं,
बाप-बेटे की लड़ाई में, माँ सहमकर सो जाती है।
असहमति से सस्ती, कोई चीज़ नहीं बस्ती में,
अपराध भी बिकता है, अब मौज-मस्ती में।
उलझन जितनी बढ़ती है, रास्ते कम होते जाते हैं,
हम खुद को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते, खुद से ही दूर हो जाते हैं।
— गौतम झा
उलझन
उलझन की हस्ती में, दोस्ती कम पड़ जाती है,
जब तन्हाई बोलती है, मस्ती चुप हो जाती है।
सपनों के कागज़ पर, रंग भरना अच्छा लगता है,
चाँदनी रात में भी, पुराना चाँद अच्छा लगता है।
सोचना तो अक्सर, मन की कसरत होती है,
भावों की आहट में, दिल को कहाँ फुर्सत होती है?
जब मन में शोर उठे, दुनिया बेगानी लगे,
सर्दी की भोर हो या जेठ की दोपहरी जले।
उम्मीद ही असल में, सुनहरी तक़दीर है,
हाथों की लकीर तो, आस्था की ज़ंजीर है।
खुद से ही लड़ना है, दुनिया को दिखाना है,
अजीब यह ज़माना है, हर ओर बहाना है।
उलझनों की तुरपाई में, खुशियाँ खो जाती हैं,
बाप-बेटे की लड़ाई में, माँ सहमकर सो जाती है।
असहमति से सस्ती, कोई चीज़ नहीं बस्ती में,
अपराध भी बिकता है, अब मौज-मस्ती में।
उलझन जितनी बढ़ती है, रास्ते कम होते जाते हैं,
हम खुद को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते, खुद से ही दूर हो जाते हैं।
— गौतम झा
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