सर्दी की धूप

सर्दी की धूप

सर्दी की धूप जब आँगन में उतरती है, तो सिर्फ़ ठिठुरन नहीं मिटाती, वह मौसम, जीवन और व्यवस्था के कई छिपे सवाल भी उजागर करती है।

सर्दी की धूप

सर्दी की धूप का गुनगुना गुच्छा आँगन में बिछने लगा है,
सहमे-सहमे पत्तों में सृजन का कोई सोच जगने लगा है।

ग्रीष्म के प्रकाश-पुंज ने पेड़ों को बहुत सताया है,
सर्दी की धूप ने छाँव की साँवली चादर बनाया है।

आई मॉनसून, लौटते हुए भी खूब बरसकर चली गई,
फिर आने की आस में बादल ओस से लिपटकर रोने लगी।

आँगन और छत से कार्तिक के चाँद को इतना देखा,
ईर्ष्या में सूरज भी चाँदनी का देने लगा धोखा।

जैसे ही सर्द हवा की सरसराहट की खबर चलने लगी,
संदूक से सूरज की मलमल-सी गर्माहट निकलने लगी।

बाजरा, मक्का, साग, पुदीना, गुड़ और मूँगफली,
चटाई पर आलती-पालथी, धूप में बैठी जिंदगी भली।

सुबह की धूप तन सेंके, शाम को यादें सेंकती हैं,
सर्द हवाएँ जाने क्यों बीती बातें छेड़ती हैं।

धूप की हर किरण जैसे कोई अपना संदेश लाई है,
ठिठुरे हुए मौसम में जीवन की गर्मी साथ लाई है।

खुश्क मौसम का आलसपन और सूर्य का महँगा आचरण,
जैसे शिक्षा का दमन और बेरोजगारी पर सरकार का अल्हड़पन।

धूप सबके आँगन उतरे, यह मौसम की तो मजबूरी है,
पर किसके हिस्से गर्मी कितनी, यही तो असली दूरी है।

सर्दी की धूप यूँ ही हर देहरी पर उतरती रहे,
ठिठुरते जीवन में थोड़ी-सी उम्मीद भी सँवरती रहे।

मौसम चाहे जितना बदले, एक सवाल रह जाता है,
सूरज सबका एक है, फिर उजाला क्यों बँट जाता है?

गौतम झा

 

Stay Updated with InsightfulTake

Get insightful stories, politics, culture and analysis directly in your inbox.

Subscribe Now →

Leave a Comment