जब "मैं" टूटता है, तभी आत्मबोध जन्म लेता है—यह कविता उसी परिवर्तन की कहानी कहती है।
नाज़ है
मुख़्तसर सी बात है,
मुझे तुम पर नाज़ है,
अब यही जज़्बात है,
कपकपी में भी अंदाज़ है,
सुलग रहा हर राज़ है,
दिख जाए वही आज है।।
फ़िक्र में हम हैं,
बेकल यह मन है,
स्वार्थ भी सघन है,
गुबार में नयन हैं,
बेहिसाब भ्रम हैं।।
मिल जाए तो अमन है,
खिल जाए तो चमन है,
गिर जाए तो सुमन है,
उड़ जाए तो गगन है।।
"मैं" का बस नूर था,
क्षणभंगुर सुरूर था,
कल तक जो गुरूर था,
आज बिखरा हुजूम था,
तब कहीं हुज़ूर था।।
— गौतम झा
नाज़ है
मुख़्तसर सी बात है,
मुझे तुम पर नाज़ है,
अब यही जज़्बात है,
कपकपी में भी अंदाज़ है,
सुलग रहा हर राज़ है,
दिख जाए वही आज है।।
फ़िक्र में हम हैं,
बेकल यह मन है,
स्वार्थ भी सघन है,
गुबार में नयन हैं,
बेहिसाब भ्रम हैं।।
मिल जाए तो अमन है,
खिल जाए तो चमन है,
गिर जाए तो सुमन है,
उड़ जाए तो गगन है।।
"मैं" का बस नूर था,
क्षणभंगुर सुरूर था,
कल तक जो गुरूर था,
आज बिखरा हुजूम था,
तब कहीं हुज़ूर था।।
— गौतम झा
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