क्या सच आज भी सच है, या दुविधा ने उसकी पहचान बदल दी है? 'हरे राम की दुविधा' एक ऐसी व्यंग्यात्मक कविता है जो बदलते समय, झूठ, इतिहास और मानवीय भ्रम पर गहरे सवाल उठाती है।
हरे राम की दुविधा
बदलाव प्रकृति का नियम है,
सहज, सतत और अटल है।।
प्रगति का यह विस्तार है,
जीवन का यही आधार है।।
बदलना केवल व्यवहार है,
उपहास से इसका क्या सरोकार है।।
छद्म के छंद में हँसी और परिहास,
झूठ के तंज में बदलता इतिहास।।
स्मृतियों के संदूक में सत्य का निवास,
बोझिल मन में अब कहाँ विश्वास।।
आधा, ओझल और अनाम,
चाँद-सा ठहरा उसका नाम।।
दुविधा में है हर काम,
संज्ञा हो या सर्वनाम।
विशेषण भी हुआ निष्प्राण,
ऐसा है अपना राम।।
हरे राम! हरे राम! हरे, हरे।
दुविधा से आप दूर ही रहें।।
– गौतम झा
हरे राम की दुविधा
बदलाव प्रकृति का नियम है,
सहज, सतत और अटल है।।
प्रगति का यह विस्तार है,
जीवन का यही आधार है।।
बदलना केवल व्यवहार है,
उपहास से इसका क्या सरोकार है।।
छद्म के छंद में हँसी और परिहास,
झूठ के तंज में बदलता इतिहास।।
स्मृतियों के संदूक में सत्य का निवास,
बोझिल मन में अब कहाँ विश्वास।।
आधा, ओझल और अनाम,
चाँद-सा ठहरा उसका नाम।।
दुविधा में है हर काम,
संज्ञा हो या सर्वनाम।
विशेषण भी हुआ निष्प्राण,
ऐसा है अपना राम।।
हरे राम! हरे राम! हरे, हरे।
दुविधा से आप दूर ही रहें।।
– गौतम झा
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