जब वादे सच से ज़्यादा मीठे लगने लगें और सच्चाई शोर में खोने लगे, तो समझ लो—चुनाव सिर्फ आने वाला नहीं, बल्कि पूरी तरह दस्तक दे चुका है।
चुनाव
संभावनाएँ जब वास्तविक प्रतीत होने लगें,
तो समझो! चुनाव आने वाला है।
बातों को जब ज़ोरदार समर्थन मिलने लगे,
तो समझो! कोई ‘दुर्योधन’ आने वाला है।
दुश्मनी में जब अचानक सुकून आने लगे,
तो समझो! भीतर ही भीतर कुछ ‘हासिल’ होने वाला है।
अमीरी को जब गरीबी भी लुभाने लगे,
तो समझो! कहीं हिसाब-किताब बिगड़ने वाला है।
गूंगे भी जब अचानक गुर्राने लगें,
तो समझो! माहौल में ‘गोलमाल’ होने वाला है।
बेरोज़गारी जब हर चौपाल पर छाने लगे,
तो समझो! वादों का व्यापार होने वाला है।
जनता जब सड़कों पर उतरने की बात करने लगे,
तो समझो! राजनीति में नया गठबंधन बनने वाला है।
उलझन जब खुद को ‘समाधान’ बताने लगे,
तो समझो! खैरात का दौर आने वाला है।
समस्याएँ जब चर्चा का ‘सरोकारी विषय’ बन जाएँ,
तो समझो! कहीं बड़ा हाहाकार होने वाला है।
दल-बदल जब “जरूरत” कहलाने लगे,
तो समझो! सत्ता फिर से सराबोर होने वाली है।
मौलिक अधिकार जब व्याख्याओं में बँटने लगें,
तो समझो! किसी नए षड्यंत्र की तैयारी है।
स्त्री-अस्मिता की बातें जब भाषणों में सजने लगें,
तो समझो! जुगाड़ की राजनीति तेज़ होने वाली है।
रविवार जब आराम नहीं, रैलियों में बदल जाए,
तो समझो! भ्रष्टाचार फिर से जीवंत होने वाला है।
बिना कुछ कहे ही जब सब असहज दिखने लगें,
तो समझो! बदलाव नहीं, केवल विध्वंस आने वाला है।
और सरकार जब सबसे ज़्यादा आश्वस्त दिखने लगे,
तो समझो! चुनाव का बाज़ार पूरी तरह सजने वाला है।
— गौतम झा
चुनाव
संभावनाएँ जब वास्तविक प्रतीत होने लगें,
तो समझो! चुनाव आने वाला है।
बातों को जब ज़ोरदार समर्थन मिलने लगे,
तो समझो! कोई ‘दुर्योधन’ आने वाला है।
दुश्मनी में जब अचानक सुकून आने लगे,
तो समझो! भीतर ही भीतर कुछ ‘हासिल’ होने वाला है।
अमीरी को जब गरीबी भी लुभाने लगे,
तो समझो! कहीं हिसाब-किताब बिगड़ने वाला है।
गूंगे भी जब अचानक गुर्राने लगें,
तो समझो! माहौल में ‘गोलमाल’ होने वाला है।
बेरोज़गारी जब हर चौपाल पर छाने लगे,
तो समझो! वादों का व्यापार होने वाला है।
जनता जब सड़कों पर उतरने की बात करने लगे,
तो समझो! राजनीति में नया गठबंधन बनने वाला है।
उलझन जब खुद को ‘समाधान’ बताने लगे,
तो समझो! खैरात का दौर आने वाला है।
समस्याएँ जब चर्चा का ‘सरोकारी विषय’ बन जाएँ,
तो समझो! कहीं बड़ा हाहाकार होने वाला है।
दल-बदल जब “जरूरत” कहलाने लगे,
तो समझो! सत्ता फिर से सराबोर होने वाली है।
मौलिक अधिकार जब व्याख्याओं में बँटने लगें,
तो समझो! किसी नए षड्यंत्र की तैयारी है।
स्त्री-अस्मिता की बातें जब भाषणों में सजने लगें,
तो समझो! जुगाड़ की राजनीति तेज़ होने वाली है।
रविवार जब आराम नहीं, रैलियों में बदल जाए,
तो समझो! भ्रष्टाचार फिर से जीवंत होने वाला है।
बिना कुछ कहे ही जब सब असहज दिखने लगें,
तो समझो! बदलाव नहीं, केवल विध्वंस आने वाला है।
और सरकार जब सबसे ज़्यादा आश्वस्त दिखने लगे,
तो समझो! चुनाव का बाज़ार पूरी तरह सजने वाला है।
— गौतम झा
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