छत्रपति शिवाजी : सह्याद्रि से उठती एक आवाज़

छत्रपति शिवाजी : सह्याद्रि से उठती एक आवाज़

छत्रपति शिवाजी

सह्याद्रि की ढलानों पर
जब धुंध उतरती थी,
तब एक सपना
चुपचाप आकार ले रहा था।

वो सपना तलवार का नहीं था,
वो सपना स्वाभिमान का था।

एक बालक
जिसकी आँखों में
माँ जीजाबाई की सीख थी,
और दिल में
अपनी मिट्टी की गर्माहट।

उसने सीखा था
कि राजमहल विरासत से नहीं,
हौसले से बनते हैं।

छत्रपति शिवाजी
नाम लेते ही
हवा में एक भरोसा तैरता है।
जैसे कोई कह रहा हो,
अपना आसमान
माँगा नहीं जाता,
जीता जाता है।

उन्होंने किलों को जीता,
पर उससे पहले
लोगों का विश्वास जीता।
उन्होंने तलवार उठाई,
पर उससे पहले
अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाई।

जब वेजय भवानीकहते,
तो पहाड़ गूँजते थे
पर उससे ज़्यादा
गूँजता था एक विचार,
कि यह धरती
किसी डर की जागीर नहीं।

उन्होंने सिखाया
कि संख्या नहीं,
संकल्प बड़ा होता है।
कि अँधेरे चाहे जितने गहरे हों,
एक चिंगारी
इतिहास बदल सकती है।

आज भी
जब देश किसी मोड़ पर खड़ा होता है,
जब निराशा
दिल के दरवाज़े खटखटाती है,
तब सह्याद्रि की तरफ़ से
एक धीमी सी पुकार आती है

झुको मत।
अपने हिस्से का स्वराज
खुद लिखो।

छत्रपति शिवाजी
सिर्फ़ एक नाम नहीं,
एक चेतना हैं
जो हर भारतीय को याद दिलाती है
कि साहस विरासत में नहीं मिलता,
उसे जिया जाता है।

और जब तक
इस मिट्टी में आत्मसम्मान साँस लेता रहेगा,
तब तक
शिवाजी का स्वप्न
हमारी धड़कनों में धड़कता रहेगा।

-गौतम झा

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1 Comment

पंकज कुमार
3 months ago
Bahut khub
InsightfulTake Team
Thank you for sharing your thoughts. We appreciate your feedback and engagement with InsightfulTake.