खिचड़ी
- Poems
- 24th June 2024
खिचड़ी एक पात्र में जब संग पकें,चावल, दाल मिलकर एक रहें।भेद सभी फिर...
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खिचड़ी एक पात्र में जब संग पकें,चावल, दाल मिलकर एक रहें।भेद सभी फिर...
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Resilience in Paradox Life offers many excuses to sit idle,But one strong reason to rise is being a go-getter.Failures haunt my every venture,Yet hopes persist, stirring...
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हरे राम की दुविधा बदलाव प्रकृति का नियम है,सहज, सतत और अटल...
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तुम याद आते हो तुम याद आते हो...शाम के सितारों में नहीं,तपती हुई दोपहर...
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रफ़ा-दफ़ा दबी हुई आह की गिरफ़्त में हूँ मैं,दीद की दहकती फ़ेहरिस्त...
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कैसा है चाँद? संज्ञा यह विशेष है,सार्थक इसका संदेश है।रात का यह...
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अस्मिता 'मैं' का अस्मिता 'मैं' का, विमर्श में तय होने लगा,किरदार किसी...
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राधा–श्याम सागर-मंथन की मोहिनी,अमृत-कलश की संगिनी,भाव-भुवन की मधुर...
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समय क्या बकवास है? राम-रहीम की धरती पर,मानवता की जड़ता पर,घर-घर फैल...
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कुछ पता नहीं आवाज़ें कब शोर बन गईं, पता नहीं,ख़ामोशी कब तन्हाई बन गई,...
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