राधा-श्याम

राधा-श्याम

राधाश्याम

सागर मंथन की मोहिनी,
अमृत-कलश की संगिनी,
भव-भावों से भरी रागिनी,
वर्तिका की उजियारी-सी दामिनी।

राधा की नैसर्गिक काया,
श्याम के मन को ऐसा भाया
फिर, प्रेम की क्या माया,
जिसमें अनंत, अविरल अनुराग है छाया।

स्नेह की इस गागर को,
श्याम-सुंदर ने अपने सागर में,
रच-रच कर रास रचाया,
मुट्ठी-बंद जुगनू-सा दास बनाया।

कथा का अंत है विकल,
रह जाते दोनों ही वेकल,
राधा का संदेश क्या है?
श्याम का उपदेश क्या है?

युगों की अभिलाषा है राधा,
तृष्णा की भाषा है राधा,
आलस मन की भोर है राधा,
संगीत-लय की गठजोड़ है राधा।

सुख की क्या सीमा है?
इच्छा की कोई बीमा है?
अधूरी आस ही परिणय है,
संपूर्णता में कहाँ अनुनय या विनय है।

गौतम झा

 

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2 Comments

G
Gunja
1 year ago
❣️👌🙏
InsightfulTake Team
Thank you for sharing your thoughts. We appreciate your feedback and engagement with InsightfulTake.
C
Chiku
1 year ago
bahut sunder
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