भस्म और भ्रम
- Poems
- 18th October 2025
भस्म और भ्रम लंका नहीं बचा पाया शीश चढ़ाने वाला,किस वहम में जी रहे...
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भस्म और भ्रम लंका नहीं बचा पाया शीश चढ़ाने वाला,किस वहम में जी रहे...
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समानांतर दुनिया सोशल मीडिया की चौखट पर,हर चेहरा मुस्कान में लिपटा...
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दीवाली में रेल यात्रा पटरी पे रेंगती रेल थकी-सी,कचरे में लिपटी,...
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भाई दूज दीयों की लौ में मुस्कान झलके,भाई दूज फिर आ ही गई।राखी के धागे...
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नहाय-खाय तालाबों में, नदियों में, सागर के जल में स्नान किया,भक्ति ने...
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खरना आज खरना है, छठ का दूसरा दिन आया,मन-तन की पवित्रता का एहसास...
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छठ पर्व न आरती की गूँज यहाँ, न पटाखों का शोर,दीप जलें तो भक्ति से, न लोभ...
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मनुष्य और वृक्ष धरती की गोद में दोनों जमे हैं समान,एक रस पीता जल का,...
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बैंगन-वृक्ष यह तना, यह ऊँचा विस्तार — क्या केवल बैंगन है?या वर्षों...
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लौह पुरुष नडियाद में जन्म लिया, एक साधारण किसान परिवार में,वल्लभ नाम...
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