बिहार की राजनीति, विकास और व्यवस्था पर एक तीखा व्यंग्य, जो वर्तमान की विडंबनाओं के बीच भविष्य की उम्मीद और सवाल दोनों तलाशता है।
बिहार का परिदृश्य
बिहार भारत का एक राज्य है,
तेरह करोड़ लोगों का स्वराज है।
अड़तीस जिलों का विस्तार है,
उनचास सांसदों का नौकाविहार है।
दो सौ तैंतालीस विधायकों का विधान है,
पचहत्तर विधान पार्षदों का मान है।
पैंतालीस हज़ार गाँवों का संसार है,
आठ हज़ार पंचायतों का विस्तार है।
मानवता के विकास में जड़ता का भाव है,
लगभग दो करोड़ कर्मचारियों का प्रभाव है।
साक्षरता में भी निचला पायदान है,
श्रीकृष्ण से नीतीश तक यही प्रमाण है।
नालंदा शिक्षा का विश्व-विख्यात स्थान है,
ज्ञान की धरती का अपना अभिमान है।
लालू, राबड़ी, तेज प्रताप और तेजस्वी,
पूछो, धरती पर कौन इन-सा ओजस्वी?
सही मार्ग का अनुसरण करनेवाला,
नूतन पथ पर बिजली देनेवाला,
दो दशकों से यही दोहरानेवाला,
है नीतीश, कुछ और भी करनेवाला?
मनरेगा से सबका कल्याण होगा,
राशन-पेंशन का अभियान होगा।
आँगनवाड़ी, शिक्षामित्र, आशा वर्कर होंगे,
फिर पूछें, इससे हालात क्या बेहतर होंगे?
चलो, वर्तमान तो त्रस्त है,
देखें, भविष्य में क्या आश्वस्त है।
प्रशांत आजकल बहुत व्यस्त हैं,
गांधी के मार्ग फिर प्रशस्त हैं।
आंदोलन नहीं, अनुमोदन है,
आवश्यकताओं का संबोधन है।
पदयात्रा में आस का प्रबंधन है,
लाचारी का नया आवंटन है।
पर याद रहे, पदयात्रा से जो पहचान बने,
इतिहास में वही नाम महान बने।
जो जनता की पीड़ा को आवाज़ दे,
वही समय के पन्नों में आज़ाद रहे।
गौतम झा
बिहार का परिदृश्य
बिहार भारत का एक राज्य है,
तेरह करोड़ लोगों का स्वराज है।
अड़तीस जिलों का विस्तार है,
उनचास सांसदों का नौकाविहार है।
दो सौ तैंतालीस विधायकों का विधान है,
पचहत्तर विधान पार्षदों का मान है।
पैंतालीस हज़ार गाँवों का संसार है,
आठ हज़ार पंचायतों का विस्तार है।
मानवता के विकास में जड़ता का भाव है,
लगभग दो करोड़ कर्मचारियों का प्रभाव है।
साक्षरता में भी निचला पायदान है,
श्रीकृष्ण से नीतीश तक यही प्रमाण है।
नालंदा शिक्षा का विश्व-विख्यात स्थान है,
ज्ञान की धरती का अपना अभिमान है।
लालू, राबड़ी, तेज प्रताप और तेजस्वी,
पूछो, धरती पर कौन इन-सा ओजस्वी?
सही मार्ग का अनुसरण करनेवाला,
नूतन पथ पर बिजली देनेवाला,
दो दशकों से यही दोहरानेवाला,
है नीतीश, कुछ और भी करनेवाला?
मनरेगा से सबका कल्याण होगा,
राशन-पेंशन का अभियान होगा।
आँगनवाड़ी, शिक्षामित्र, आशा वर्कर होंगे,
फिर पूछें, इससे हालात क्या बेहतर होंगे?
चलो, वर्तमान तो त्रस्त है,
देखें, भविष्य में क्या आश्वस्त है।
प्रशांत आजकल बहुत व्यस्त हैं,
गांधी के मार्ग फिर प्रशस्त हैं।
आंदोलन नहीं, अनुमोदन है,
आवश्यकताओं का संबोधन है।
पदयात्रा में आस का प्रबंधन है,
लाचारी का नया आवंटन है।
पर याद रहे, पदयात्रा से जो पहचान बने,
इतिहास में वही नाम महान बने।
जो जनता की पीड़ा को आवाज़ दे,
वही समय के पन्नों में आज़ाद रहे।
गौतम झा
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