मानव परिदृश्य

मानव परिदृश्य

मानव परिदृश्य

प्रकाश पुंज के प्रसार से प्रारंभ है,
सूर्योदय से जीवन का शुभारंभ है।
रोशनी की विसात में कई आकार हैं,
जीवों का एक अद्भुत बाजार है।

सुबह से शाम दिन का है काम,
शाम को लौटकर थोड़ा विराम।
दिन के इनाम से है रात का काम,
एक सी दिनचर्या सब में है आम।

घड़ी ने दिन और रात को घंटों में बांटा,
भाजक आठ को चौबीस भाज्य से काटा।
तीन भागफल से है दिनचर्या का नाता,
गणितज्ञ का नाम है विधाता।

सुविधाओं से भरा एक महाजाल है,
मछली बना भागता-फिरता संसार है।
वैभवता का नव नूतन आविष्कार है,
संचालन पर बैठा एक सरकार है।

जीवन का भेद बड़ा अभेद्य है,
मृत्यु शायद अंतिम उद्देश्य है।
अभेद्य उद्देश्य ने निवेश किया,
धर्म का विषय प्रवेश किया।

धर्म का फिर प्रचार हुआ,
भाषा पर धर्म सवार हुआ।
व्यापार को भी सरोकार हुआ,
एक नया आर्थिक बाजार हुआ।

बाजार ने सघन विचार किया,
दिनचर्या पर उत्पाद इजाद किया।
जनता को फिर विश्वास दिलाया,
आराम से गुजरता दिन दिखाया।

आराम का मूल्य तय हुआ,
पैसा का फिर उदय हुआ।
प्रकृति पर अब संदेह हुआ,
दोष दानव सब विशेष हुआ।

राहत चाहत पर असर हुआ,
स्वास्थ्य जब गड़बड़ हुआ।
चिकित्सा को सही अवसर मिला,
इसमें भी धर्म सबसे श्रेयस्कर बना।

मृत्यु के बाद क्या है?
अज्ञात में एक राज है।
अध्यात्म की ये बात है,
संशय तो इसमें अपराध है।

गौतम झा

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