मानव परिदृश्य

मानव परिदृश्य

मनुष्य ने जीवन को सुविधाओं से सजाया, समय को घड़ी में बाँटा और मृत्यु के रहस्य को धर्म और अध्यात्म में खोजा। फिर भी जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।

मानव परिदृश्य

प्रकाश-पुंज के प्रसार से प्रारंभ है,
सूर्योदय से जीवन का शुभारंभ है।
रोशनी की बिसात पर अनगिनत आकार हैं,
जीवों का यह संसार भी क्या अद्भुत संसार है।

सुबह से शाम तक दिन का काम,
शाम ढले लौटकर थोड़ा विराम।
दिन के श्रम से रात का आराम,
एक-सी दिनचर्या, सबके नाम।

घड़ी ने दिन-रात को घंटों में बाँटा,
आठ के भाजक से चौबीस को काटा।
तीन भागों में बँटा जीवन का नाता,
गणितज्ञ का नाम ही शायद विधाता।

सुविधाओं से बुना एक महाजाल है,
मछली-सा भागता यह सारा संसार है।
वैभव के नित नए आविष्कार हैं,
व्यवस्था की बागडोर थामे सरकार है।

जीवन का भेद अभी भी अभेद्य है,
मृत्यु शायद उसका अंतिम उद्देश्य है।
जब अनुत्तरित प्रश्न ने निवेश किया,
धर्म ने आकर अपना प्रवेश किया।

धर्म का फिर प्रचार हुआ,
भाषा पर भी धर्म सवार हुआ।
व्यापार को भी इसमें सरोकार हुआ,
और एक नया आर्थिक बाजार हुआ।

बाजार ने फिर गहन विचार किया,
दिनचर्या के लिए उत्पाद तैयार किया।
जनता को सुख का विश्वास दिलाया,
आराम से दिन गुजारना सिखाया।

आराम का भी मूल्य तय हुआ,
पैसे का फिर उदय हुआ।
प्रकृति पर अब संदेह हुआ,
हर दोष का कोई दानव विशेष हुआ।

राहत की चाहत पर असर हुआ,
जब स्वास्थ्य का संतुलन गड़बड़ हुआ।
चिकित्सा को अवसर मिला,
यहाँ भी धर्म सबसे श्रेयस्कर बना।

मृत्यु के बाद आखिर क्या है?
अज्ञात में छिपा कोई राज है।
अध्यात्म शायद उसी की बात है,
जहाँ संशय करना भी अपराध है।

गौतम झा

 

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