जब भीतर का अंधकार गहराए, तब महादेव के नाम का एक दीप ही काफी है।
महादेव की महिमा
भू पर छाया तम गहन, नभ में गूँजे रुद्र-गान,
कैलाश-पथ से आज फिर, आया शिव का दिव्य ज्ञान।
मौन हुईं दिशाएँ सारी, थम-सा गया संसार,
शिव की धुन में डूब गया, यह जीवन का विस्तार।
गंग धार झर-झर बहे, जटा में बहता काल-स्रोत,
चंद्र किरण मुस्काती माथे, हर ले मन का तम-क्षोभ।
भस्म विभूषित अंग श्याम, कर में त्रिशूल प्रचंड,
नेत्रों में संचित अग्नि, मस्तक पर चंद्र अखंड।
कंठ नील, विष धारण करके, जग का दुःख हर लेते,
अपने हिस्से पीड़ा रखकर, सबको अमृत देते।
भोले हैं, पर भेद जगत के, पल में जान लिया करते,
जो भी शरण में आ जाए, उसको अपना कर लेते।
नटराज के नाद से काँपे, यह सारा जग, यह लोक,
डमरू की ध्वनि में जागे, सृष्टि का हर एक संयोग।
रुद्र-तांडव, योगी-ध्यान, शिव में लय है ब्रह्म का गान,
शून्य में भी जिनकी सत्ता, कण-कण में जिनका स्थान।
संहार करें तम-पाश का, कर दें भय का अंत,
विनाश की राख से फिर, जन्मे सृजन अनंत।
अंतर के अंधकार को हरकर, चेतना में ज्योति जलाएँ,
भटके हुए कदमों को प्रभु, फिर सत्य-पथ पर लाएँ।
बेल-पत्र, जल, अक्षत चढ़े, गूँजे हर-हर का गान,
दीप जले मन-मंदिर में, पावन हो हर प्राण।
धूप-सुगंध से भर उठे, मंदिर का आकाश,
शिव के चरणों में मिल जाए, जीवन का विश्वास।
कोई माँगे धन और वैभव, कोई माँगे मान,
कोई माँगे सुख की छाया, कोई माँगे ज्ञान।
मैं तो केवल इतना माँगूँ, हे कैलाशपति भगवान,
सत्य-पथ से डिगने न पाए, मेरा यह मन-प्राण।
जब जीवन में दुख की आँधी, आशाओं को ढक जाए,
जब अपने ही प्रश्नों का उत्तर, मन को कहीं न मिल पाए,
तब तेरे ही नाम का दीपक, भीतर धीरे-धीरे जले,
टूटे मन को धीरज देकर, फिर जीने का साहस मिले।
श्मशान-वासी, विरागी शंकर, फिर भी जग के नाथ,
तेरी करुणा से सुगम हो जाए, जीवन का हर कठिन पथ।
माया के इस मोह-जाल में, बुद्धि रहे निष्काम,
हर श्वास बने तेरी पूजा, हर धड़कन तेरा नाम।
न कोई अपना, न पराया, सबमें तेरा रूप,
तेरी दृष्टि पड़े तो मिट जाए, मन का सारा संताप।
जाति-पंथ के बंधन टूटें, मिटे घृणा-अभिमान,
हर हृदय में करुणा जागे, हर मुख पर हो मुस्कान।
शिवरात्रि केवल पर्व नहीं, यह भीतर जागरण है,
अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का शुभ क्षण है।
जो बाहर मंदिर खोज रहा, वह भीतर भी झाँके,
शिव तो उस चेतन मन में हैं, जो सत्य के दीपक बाँटे।
विष भी आए जीवन-पथ पर, नीलकंठ-सा धैर्य रहे,
सुख आए तो विनम्र रहें, दुख आए तो विश्वास रहे।
कर्म हमारे निर्मल हों और वाणी में हो सत्य,
शिव का नाम रहे अधरों पर, हृदय रहे शिवमय नित्य।
डमरू की हर थाप सुनाए, जीवन क्षणभंगुर है,
कालचक्र के आगे जग का, हर वैभव अस्थिर है।
जो पाया वह छूट जाएगा, जो आया वह जाएगा,
शिव-चरणों में जो समर्पित हो, वही अमर हो जाएगा।
आओ आज प्रणाम करें उस, आदियोगी अविनाशी को,
जो धारण करते काल स्वयं, फिर भी देते जीवन को।
जिसके चरणों में मिट जाता, अहंकार का सारा भार,
जिसके नाम से पार उतरता, भवसागर संसार।
हे महादेव, मेरे भीतर, ऐसा एक प्रकाश भरो,
झूठ के आगे झुकूँ नहीं, सत्य हेतु विश्वास भरो।
लोभ-मोह से दूर रखो, मन में निर्मल भाव भरो,
अपने चरणों की धूल बनाकर, जीवन को निष्काम करो।
शिवमय हो यह चेतना, जागे हर हृदय में प्राण,
हर घर में शांति उतर आए, हर मन में हो कल्याण।
रुद्र बने करुणा के सागर, शंकर बनें वरदान,
हर-हर महादेव की ध्वनि से, पावन हो हिंदुस्तान।
शिवरात्रि यह चेतन कर दे, मिट जाए हर संशय-भ्रमजाल,
अंतर में जागे सत्य-सूर्य, दूर हो जीवन का तम-जाल।
हर श्वास कहे महादेव को, हर कर्म बने उपकार,
तेरे चरणों में अर्पित हो, यह जीवन बारंबार।
हर-हर महादेव गूँजे, गूँजे शिव का नाम,
शिव की ज्योति से जगमग हो, धरती और आसमान।
मन में शिव, वाणी में शिव, कर्मों में शिव का वास,
हे नीलकंठ, हे भोलेनाथ, रखना सदा विश्वास।
— गौतम झा
महादेव की महिमा
भू पर छाया तम गहन, नभ में गूँजे रुद्र-गान,
कैलाश-पथ से आज फिर, आया शिव का दिव्य ज्ञान।
मौन हुईं दिशाएँ सारी, थम-सा गया संसार,
शिव की धुन में डूब गया, यह जीवन का विस्तार।
गंग धार झर-झर बहे, जटा में बहता काल-स्रोत,
चंद्र किरण मुस्काती माथे, हर ले मन का तम-क्षोभ।
भस्म विभूषित अंग श्याम, कर में त्रिशूल प्रचंड,
नेत्रों में संचित अग्नि, मस्तक पर चंद्र अखंड।
कंठ नील, विष धारण करके, जग का दुःख हर लेते,
अपने हिस्से पीड़ा रखकर, सबको अमृत देते।
भोले हैं, पर भेद जगत के, पल में जान लिया करते,
जो भी शरण में आ जाए, उसको अपना कर लेते।
नटराज के नाद से काँपे, यह सारा जग, यह लोक,
डमरू की ध्वनि में जागे, सृष्टि का हर एक संयोग।
रुद्र-तांडव, योगी-ध्यान, शिव में लय है ब्रह्म का गान,
शून्य में भी जिनकी सत्ता, कण-कण में जिनका स्थान।
संहार करें तम-पाश का, कर दें भय का अंत,
विनाश की राख से फिर, जन्मे सृजन अनंत।
अंतर के अंधकार को हरकर, चेतना में ज्योति जलाएँ,
भटके हुए कदमों को प्रभु, फिर सत्य-पथ पर लाएँ।
बेल-पत्र, जल, अक्षत चढ़े, गूँजे हर-हर का गान,
दीप जले मन-मंदिर में, पावन हो हर प्राण।
धूप-सुगंध से भर उठे, मंदिर का आकाश,
शिव के चरणों में मिल जाए, जीवन का विश्वास।
कोई माँगे धन और वैभव, कोई माँगे मान,
कोई माँगे सुख की छाया, कोई माँगे ज्ञान।
मैं तो केवल इतना माँगूँ, हे कैलाशपति भगवान,
सत्य-पथ से डिगने न पाए, मेरा यह मन-प्राण।
जब जीवन में दुख की आँधी, आशाओं को ढक जाए,
जब अपने ही प्रश्नों का उत्तर, मन को कहीं न मिल पाए,
तब तेरे ही नाम का दीपक, भीतर धीरे-धीरे जले,
टूटे मन को धीरज देकर, फिर जीने का साहस मिले।
श्मशान-वासी, विरागी शंकर, फिर भी जग के नाथ,
तेरी करुणा से सुगम हो जाए, जीवन का हर कठिन पथ।
माया के इस मोह-जाल में, बुद्धि रहे निष्काम,
हर श्वास बने तेरी पूजा, हर धड़कन तेरा नाम।
न कोई अपना, न पराया, सबमें तेरा रूप,
तेरी दृष्टि पड़े तो मिट जाए, मन का सारा संताप।
जाति-पंथ के बंधन टूटें, मिटे घृणा-अभिमान,
हर हृदय में करुणा जागे, हर मुख पर हो मुस्कान।
शिवरात्रि केवल पर्व नहीं, यह भीतर जागरण है,
अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का शुभ क्षण है।
जो बाहर मंदिर खोज रहा, वह भीतर भी झाँके,
शिव तो उस चेतन मन में हैं, जो सत्य के दीपक बाँटे।
विष भी आए जीवन-पथ पर, नीलकंठ-सा धैर्य रहे,
सुख आए तो विनम्र रहें, दुख आए तो विश्वास रहे।
कर्म हमारे निर्मल हों और वाणी में हो सत्य,
शिव का नाम रहे अधरों पर, हृदय रहे शिवमय नित्य।
डमरू की हर थाप सुनाए, जीवन क्षणभंगुर है,
कालचक्र के आगे जग का, हर वैभव अस्थिर है।
जो पाया वह छूट जाएगा, जो आया वह जाएगा,
शिव-चरणों में जो समर्पित हो, वही अमर हो जाएगा।
आओ आज प्रणाम करें उस, आदियोगी अविनाशी को,
जो धारण करते काल स्वयं, फिर भी देते जीवन को।
जिसके चरणों में मिट जाता, अहंकार का सारा भार,
जिसके नाम से पार उतरता, भवसागर संसार।
हे महादेव, मेरे भीतर, ऐसा एक प्रकाश भरो,
झूठ के आगे झुकूँ नहीं, सत्य हेतु विश्वास भरो।
लोभ-मोह से दूर रखो, मन में निर्मल भाव भरो,
अपने चरणों की धूल बनाकर, जीवन को निष्काम करो।
शिवमय हो यह चेतना, जागे हर हृदय में प्राण,
हर घर में शांति उतर आए, हर मन में हो कल्याण।
रुद्र बने करुणा के सागर, शंकर बनें वरदान,
हर-हर महादेव की ध्वनि से, पावन हो हिंदुस्तान।
शिवरात्रि यह चेतन कर दे, मिट जाए हर संशय-भ्रमजाल,
अंतर में जागे सत्य-सूर्य, दूर हो जीवन का तम-जाल।
हर श्वास कहे महादेव को, हर कर्म बने उपकार,
तेरे चरणों में अर्पित हो, यह जीवन बारंबार।
हर-हर महादेव गूँजे, गूँजे शिव का नाम,
शिव की ज्योति से जगमग हो, धरती और आसमान।
मन में शिव, वाणी में शिव, कर्मों में शिव का वास,
हे नीलकंठ, हे भोलेनाथ, रखना सदा विश्वास।
— गौतम झा
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