रिश्ते खून से बनते हैं, लेकिन उनकी असली उम्र प्यार, विश्वास और अपनापन तय करते हैं।
उम्मीद के रिश्ते
उम्मीदों पर टिके रिश्ते, नतीजे फिर भी बिखरे हैं,
जो होगा, वो देखेंगे, क्यों सोचें इतने पहरे हैं।
रिश्ते सारे भावों के हैं, भावों पर ही टिके हुए,
स्वार्थ जहाँ हावी हो जाए, रिश्ते लगते फीके हुए।
माँ-बाप, भाई-बहन, बचपन के कितने रंग,
एक बहू के आने से बदल गया घर का ढंग।
कल तक जो आँगन हँसता था, आज वहाँ खामोशी है,
अपने ही रिश्तों के बीच क्यों इतनी बेहोशी है।
द्वंद्व की हुई शुरुआत, रिश्ते बँट गए अपने आप,
सास-बहू, ननद-भौजाई, देवर-भाभी के संताप।
सास-बहू पहले सहमीं, ननद-भाभी थोड़ी उलझीं,
हर मन में आशंकाएँ थीं, हर आँख में बातें सुलगीं।
ससुर ने सबका हाल समझा, पति हुआ भीतर से परेशान,
नए-नए स्वर उठने लगे, घटने लगा मान-सम्मान।
सास-ननद का अपना राग था, देवर का अपना तेवर,
हर कोई अपनी बात पर अड़ा, कोई न झुका एक कदम भर।
भाई भी कुछ बहक गया, देवर का तेवर और बढ़ा,
माँ ने अपनी पीड़ा कही, घर का संतुलन फिर बिगड़ा।
ननद ने अपनी राह पकड़ी, देवर दुल्हन घर ले आया,
भौजी का मन मुरझाया, घर ने नया रंग दिखाया।
भाई ने अपना भवन बनाया, देवर मन ही मन इतराया,
एक की खुशियों के आगे, दूसरे का मन भरमाया।
परिवार में परहेज़ बढ़ा, अपनापन कम होने लगा,
उद्देश्य पीछे छूट गए, स्वार्थ आगे आने लगा।
माता-पिता हुए परेशान, सबकी नज़र पेंशन पर थी,
सेवा और सम्मान की बातें, जैसे केवल कहने भर थीं।
पिता का आखिर देहांत हुआ, माँ घर की प्रधान बनीं,
ममता के साथ अधिकार आया, अपनी-अपनी पहचान बनी।
श्रेष्ठ-कनिष्ठ का भेद न था, सबका अपना मान हुआ,
पर ममता जब मुखर हुई, घर में नया विधान हुआ।
पहले रोटी का हिसाब लगा, फिर हिस्सों का बँटवारा हुआ,
छोटे को राज दिलाने में, अपनों का किनारा हुआ।
उम्मीदों से बने ये रिश्ते, उम्मीदों में ही टूट गए,
स्वार्थ की आँधी आई तो, कितने अपने छूट गए।
खून के रिश्ते पास रहे, मन फिर भी दूर हो गए,
साथ रहे एक छत के नीचे, फिर भी मजबूर हो गए।
रिश्ते केवल खून नहीं हैं, रिश्ते भाव से बनते हैं,
प्यार, भरोसे और त्याग से रिश्ते जीवन भर चलते हैं।
जहाँ स्वार्थ का राज हुआ, वहाँ अपनापन हार गया,
घर तो घर ही रहा मगर, परिवार कहीं खो गया।
गौतम झा
उम्मीद के रिश्ते
उम्मीदों पर टिके रिश्ते, नतीजे फिर भी बिखरे हैं,
जो होगा, वो देखेंगे, क्यों सोचें इतने पहरे हैं।
रिश्ते सारे भावों के हैं, भावों पर ही टिके हुए,
स्वार्थ जहाँ हावी हो जाए, रिश्ते लगते फीके हुए।
माँ-बाप, भाई-बहन, बचपन के कितने रंग,
एक बहू के आने से बदल गया घर का ढंग।
कल तक जो आँगन हँसता था, आज वहाँ खामोशी है,
अपने ही रिश्तों के बीच क्यों इतनी बेहोशी है।
द्वंद्व की हुई शुरुआत, रिश्ते बँट गए अपने आप,
सास-बहू, ननद-भौजाई, देवर-भाभी के संताप।
सास-बहू पहले सहमीं, ननद-भाभी थोड़ी उलझीं,
हर मन में आशंकाएँ थीं, हर आँख में बातें सुलगीं।
ससुर ने सबका हाल समझा, पति हुआ भीतर से परेशान,
नए-नए स्वर उठने लगे, घटने लगा मान-सम्मान।
सास-ननद का अपना राग था, देवर का अपना तेवर,
हर कोई अपनी बात पर अड़ा, कोई न झुका एक कदम भर।
भाई भी कुछ बहक गया, देवर का तेवर और बढ़ा,
माँ ने अपनी पीड़ा कही, घर का संतुलन फिर बिगड़ा।
ननद ने अपनी राह पकड़ी, देवर दुल्हन घर ले आया,
भौजी का मन मुरझाया, घर ने नया रंग दिखाया।
भाई ने अपना भवन बनाया, देवर मन ही मन इतराया,
एक की खुशियों के आगे, दूसरे का मन भरमाया।
परिवार में परहेज़ बढ़ा, अपनापन कम होने लगा,
उद्देश्य पीछे छूट गए, स्वार्थ आगे आने लगा।
माता-पिता हुए परेशान, सबकी नज़र पेंशन पर थी,
सेवा और सम्मान की बातें, जैसे केवल कहने भर थीं।
पिता का आखिर देहांत हुआ, माँ घर की प्रधान बनीं,
ममता के साथ अधिकार आया, अपनी-अपनी पहचान बनी।
श्रेष्ठ-कनिष्ठ का भेद न था, सबका अपना मान हुआ,
पर ममता जब मुखर हुई, घर में नया विधान हुआ।
पहले रोटी का हिसाब लगा, फिर हिस्सों का बँटवारा हुआ,
छोटे को राज दिलाने में, अपनों का किनारा हुआ।
उम्मीदों से बने ये रिश्ते, उम्मीदों में ही टूट गए,
स्वार्थ की आँधी आई तो, कितने अपने छूट गए।
खून के रिश्ते पास रहे, मन फिर भी दूर हो गए,
साथ रहे एक छत के नीचे, फिर भी मजबूर हो गए।
रिश्ते केवल खून नहीं हैं, रिश्ते भाव से बनते हैं,
प्यार, भरोसे और त्याग से रिश्ते जीवन भर चलते हैं।
जहाँ स्वार्थ का राज हुआ, वहाँ अपनापन हार गया,
घर तो घर ही रहा मगर, परिवार कहीं खो गया।
गौतम झा
Leave a Comment